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Article : अमेरिक़ी जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट सेंटर रिपोर्ट 2026

Naya Savera Network

क्या जलवायु परिवर्तन हमारी नींद चुरा रहा है? -बढ़ती गर्म रातें,घटती गहरी नींद और मानव स्वास्थ्य पर मंडराता वैश्विक संकट

अब जलवायु परिवर्तन का नया पैमाना होगी हमारी नींद? -समग्र व्यापक विश्लेषण

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन पर अधिकांश चर्चा बाढ़,सूखा,समुद्र-स्तर वृद्धि और भीषण हीटवेव तक सीमित रही है।किंतु अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित किया है,जो प्रत्यक्ष रूप से हर व्यक्ति के जीवन,स्वास्थ्य, उत्पादकता और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। वह है नींद का नुकसान (स्लीप लॉस)। अमेरिका की जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट सेंटर द्वारा 2020 से 2025 के बीच विश्व के 1,300 से अधिक शहरों (लगभग 1,338 शहरों) पर किए गए विश्लेषण में पाया गया कि बढ़ते रात्रिकालीन तापमान के कारण एक औसत व्यक्ति वैश्विक स्तरपर प्रति वर्ष लगभग 56 घंटे की नींद खो रहा है। भारत के कई बड़े शहरों में यह नुकसान 65 से 93 घंटे प्रति वर्ष तक पहुँच गया है।अध्ययन में यह भी बताया गया कि इस तापमान- जनित नींद हानि का कम से कम लगभग 10 प्रतिशत भाग सीधे मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते यह कहना चाहूंगा कि यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है क़ि यह मूल दावा काफी हद तक सही है,लेकिन इसमें एक छोटा-सा स्पष्टीकरण आवश्यक है। अध्ययन यह नहीं कहता कि पूरे भारत का प्रत्येक नागरिक 65-93 घंटे की नींद खो रहा है,बल्कि यह आँकड़ा भारत के कई बड़े शहरों के लिए है। उदाहरण के तौर पर चेन्नई में लगभग 93 घंटे, मुंबई में लगभग 84 घंटे और कोलकाता में लगभग 80 घंटे वार्षिक नींद हानि का अनुमान लगाया गया। वैश्विक औसत लगभग 56 घंटे प्रतिवर्ष बताया गया। 
साथियों, भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय देश में समस्या इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यहाँ गर्मी अब केवल दिन तक सीमित नहीं रहती।पहले सूर्यास्त के बाद तापमान में पर्याप्त गिरावट आ जाती थी, जिससे शरीर को ठंडा होने और गहरी नींद (डीप स्लीप) में जाने का अवसर मिलता था। अब महानगरों में कंक्रीट, डामर, वाहनों की गर्मी और हरित क्षेत्र में कमी के कारण अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट विकसित हो गया है।परिणाम स्वरूप रात का तापमान भी ऊँचा बना रहता है और शरीर अपनी प्राकृतिक ताप- नियंत्रण प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाता।यही कारण है कि भारत के अनेक शहरों में लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि रात में भी बेचैनी बनी रहती है और नींद सटीकता से  बार-बार टूटती है। 
साथियों,चिकित्सकीय दृष्टि से देखा जाए तो गहरी नींद मानव शरीर की प्राकृतिक मरम्मत प्रक्रिया है। इसी अवस्था में मस्तिष्क दिनभर की सूचनाओं को व्यवस्थित करता है,स्मरण शक्ति मजबूत होती है,प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय होता है,हार्मोन संतुलित होते हैं तथा हृदय एवं रक्त वाहिनियों को विश्राम मिलता है। यदि लगातार गहरी नींद कम हो जाए तो सबसे पहले मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन निर्णय क्षमता में कमी और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई दिखाई देती है। इसके बाद धीरे-धीरे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग, स्ट्रोक, अवसाद, चिंता तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। 
साथियों, वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि शरीर को सोने के लिए अपने आंतरिक तापमान को थोड़ा कम करना पड़ता है। यदि रात का वातावरण अधिक गर्म हो, तो यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है। व्यक्ति को नींद आने में अधिक समय लगता है,रात में कई बार जागना पड़ता है और सबसे महत्वपूर्ण,गहरी नींद का समय घट जाता है। यही कारण है कि सुबह उठने के बाद भी व्यक्ति स्वयं को थका हुआ महसूस करता है।इसका प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। नींद की कमी सीधे अर्थव्यवस्था पर भी असर डालती है।पर्याप्त नींद न मिलने से कर्मचारियों की कार्यक्षमता घटती है, औद्योगिक दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ता है, विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। जब किसी देश की बड़ी आबादी लगातार कम गुणवत्ता वाली नींद लेने लगे तो उसका प्रभाव राष्ट्रीय उत्पादकता और आर्थिक विकास पर भी दिखाई देता है। 
साथियों, भारत में यह चुनौती इसलिए भी अधिक जटिल है क्योंकि यहाँ तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है। कंक्रीट के जंगल, कम होते पेड़, एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्म हवा, घनी आबादी और सीमित खुले स्थान शहरों को दिन और रात दोनों समय अधिक गर्म बनाए रखते हैं। गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवार, जिनके पास पर्याप्त शीतलन व्यवस्था नहीं होती, इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।हाल के वर्षों में भारत के अनेक क्षेत्रों में यह भी देखा गया है कि गर्म रातों के दौरान अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी मामलों में वृद्धि होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रात के समय शरीर को पर्याप्त ठंडक और आराम न मिले तो दिनभर की गर्मी से उत्पन्न तनाव समाप्त नहीं हो पाता, जिससे स्वास्थ्य जोखिम सटीकता से कई गुना बढ़ जाते हैं। 
साथियों, मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव भी अत्यंत गंभीर है। लगातार नींद की कमी व्यक्ति में अवसाद, चिंता तनाव,भावनात्मक अस्थिरता तथा निर्णय क्षमता में गिरावट ला सकती है। कई अध्ययनों ने संकेत दिया है कि जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक गर्मी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ा सकती है जिसमें विशेषकर उन समुदायों में जो पहले से सामाजिक या आर्थिक दबावों का सामना कर रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए केवल एयर कंडीशनर ही समाधान नहीं हैं। वैज्ञानिक शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने,छतों पर परावर्तक (कूलरूफ़) तकनीक अपनाने,वर्षा जल संरक्षण, बेहतर वेंटिलेशन वाले भवन, शहरी वृक्षारोपण, ऊर्जा- कुशल निर्माण सामग्री और हीट एक्शन प्लान को अधिक प्रभावी बनाने की सलाह दे रहे हैं। साथ ही नागरिकों को भी रात में कमरे का तापमान कम रखने, पर्याप्त पानी पीने, सोने से पहले भारी भोजन और कैफीन से बचने तथा नियमित नींद का समय बनाए रखने जैसी आदतें सटीकता से  अपनानी चाहिए। 
साथियों, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न नींद का संकट सभी आयु वर्गों को समान रूप से प्रभावित नहीं करता। बच्चे, किशोर,गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग और पहले से हृदय मधुमेह या श्वसन संबंधी रोगों से पीड़ित लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं। बच्चों में गहरी नींद मस्तिष्क के विकास, सीखने की क्षमता, स्मरण शक्ति तथा शारीरिक वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक होती है। यदि लगातार गर्म रातों के कारण उनकी नींद बाधित होती है तो पढ़ाई, व्यवहार, एकाग्रता और मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। युवाओं में नींद की कमी अवसाद, चिंता,डिजिटल लत, कार्यक्षमता में गिरावट और सड़क दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ाती है।वहींबुजुर्गों में पहले से ही नींद हल्की होती है,इसलिए अत्यधिक गर्म रातें उनके लिए उच्च रक्तचाप, हृदयाघात और स्ट्रोक का खतरा और अधिक बढ़ा देती हैं। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन का यह प्रभाव केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि पीढ़ियों के भविष्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य से सटीकता से जुड़ा हुआ विषय बन गया है। 
साथियों,भारत के महानगरों तथा तेजी से विकसित हो रहे मध्यम शहरों में कंक्रीट,डामर की सड़कों,ऊँची इमारतों वाहनों तथा एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्म हवा के कारण 'अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। शहर दिनभर सूर्य की ऊष्मा को अपने भीतर संचित कर लेते हैं और रात के समय धीरे-धीरे उसे छोड़ते रहते हैं। परिणामस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों का रात्रिकालीन तापमान कई डिग्री अधिक बना रहता है। यही कारण है कि लोगों को देर रात तक बेचैनी महसूस होती है, बार-बार नींद खुलती है और सुबह उठने पर भी थकान बनी रहती है। यदि शहरी नियोजन में हरित क्षेत्र, जलाशय, खुली भूमि, वृक्षारोपण तथा 'कूल रूफ' जैसी तकनीकों को प्राथमिकता नहीं दी गई तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। हमें ध्यान देना होगा जलवायु परिवर्तन और अर्थव्यवस्था का अदृश्य संबंध नींद की कमी केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। पर्याप्त नींद न मिलने से कर्मचारियों की उत्पादकता घटती है, निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है, औद्योगिक दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ती है तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है। विश्व स्तर पर यदि करोड़ों लोग हर वर्ष दर्जनों घंटे कीगुणवत्तापूर्ण नींद खो रहे हैं तो उसका प्रभाव सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), श्रम उत्पादकता, स्वास्थ्य बजट और सामाजिक कल्याण पर भी दिखाई देगा। इसलिए विशेषज्ञ अब जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि आर्थिक विकास, मानव पूंजी और राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता का भी मुद्दा मान रहे हैं।
भारत के लिए समय की माँग सटीकता से राष्ट्रीय स्लीप हेल्थ मिशन हैँ। 
साथियों, भारत ने हीट एक्शन प्लान, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और जलवायु परिवर्तन से संबंधित अनेक योजनाएँ शुरू की हैं, किंतु अब आवश्यकता इस बात की है कि 'स्लीप हेल्थ' को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनाया जाए। राष्ट्रीय स्तर पर नींद संबंधी 
जागरूकता अभियान, स्कूलों और कॉलेजों में स्वस्थ नींद की शिक्षा, अस्पतालों में स्लीप क्लीनिकों का विस्तार, शहरों में रात्रिकालीन तापमान की निगरानी तथा वैज्ञानिक शहरी नियोजन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि आज इस दिशा में समन्वित प्रयास किए जाते हैं तो भविष्य में करोड़ों लोगों को मानसिक और शारीरिक बीमारियों से बचाया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध हरित विकास की नीति वास्तव में स्वस्थ और सुकूनभरी नींद की भी नीति है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करे इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अब जलवायु परिवर्तन का नया पैमाना होगी हमारी नींद अब यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रहा। यह मानव स्वास्थ्य,मानसिक संतुलन, उत्पादकता शिक्षा, अर्थव्यवस्था और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा वैश्विक मुद्दा बन चुका है। यदि बढ़ती गर्म रातों को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक और स्थानीय स्तर पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में नींद का संकट भी जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हो सकता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उठाया गया प्रत्येक कदम केवल पृथ्वी को बचाने का प्रयास नहीं होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की स्वस्थ, गहरी और सुकूनभरी नींद की रक्षा का भी संकल्प होगा।

संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
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