गोंदिया - वैश्विक स्तरपर राष्ट्रीय राजमार्ग केवल शहरों और राज्यों को जोड़ने वाली सड़कें नहीं हैं, वे हर देश की आर्थिक जीवनरेखा हैं।लेकिन यही जीवनरेखा जबकिसी सड़क दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति के लिए समय पर चिकित्सा जीवनरेखा उपलब्ध नहीं करा पाती, तो सड़क सुरक्षा का प्रश्न केवल यातायात अनुशासन तक सीमित नहीं रहता,बल्कि सीधे मानव जीवन,प्रशासनिक जवाबदेही और स्वास्थ्य व्यवस्था का राष्ट्रीय प्रश्न बन जाता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि दुर्घटना के बाद सड़क किनारे तड़पता घायल व्यक्ति, आसपास खड़ी भीड़, मोबाइल से वीडियो बनाते लोग, पुलिस और कानूनी कार्रवाई के डर से पीछे हटते राहगीर और देर से पहुंचती एंबुलेंस,यह पूरा दृश्य बताता है कि कई बार दुर्घटना में लगी चोट से अधिक घातक इलाज तक पहुंचने में हुई देरी होती है। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने अगस्त 2026 के दूसरे सप्ताह में राष्ट्रीय राजमार्गों पर आपातकालीन सेवाओं के लिए कड़े सर्विस - लेवल स्टैण्डर्ड्स लागू किए हैं। नई व्यवस्था के तहत 10 किलोमीटर के दायरे में दुर्घटनास्थल तक एंबुलेंस को टिकट स्वीकार होने के बाद अधिकतम 10 मिनट में पहुंचना होगा।
साथियों बात अगर हम दस मिनट की घड़ी: दुर्घटना से अस्पताल तक हर क्षण की जवाबदेही को समझने की करें तो एनएचएआई के नए मानकों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब एंबुलेंस सेवा को केवल उपलब्ध मान लेना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसकी प्रतिक्रिया की प्रत्येक अवस्था समयबद्ध और डिजिटल रूप से मापी जाएगी। नई व्यवस्था में आपातकालीन टिकट को एक मिनट के भीतर स्वीकार करना, स्वीकार किए जाने के बाद एंबुलेंस को दो मिनट के भीतर रवाना करना और 10 किलोमीटर की सीमा के भीतर दुर्घटनास्थल तक 10 मिनट में पहुंचना निर्धारित किया गया है। 10 किलोमीटर से अधिक दूरी वाले मामलों में दूरी के अनुरूप अनुमत समय बढ़ेगा। इसके बाद घायल को निकटतम अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एक घंटे की सीमा तय की गई है। अर्थात दुर्घटना की सूचना से लेकर घटनास्थल और फिर अस्पताल तक की पूरी यात्रा अब केवल मानवीय विवेक पर नहीं, बल्कि मापनीय सेवा- मानक पर आधारित होगी।यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पुरानी व्यवस्था में अक्सर सवाल यह नहीं होता था कि एंबुलेंस उपलब्ध थी या नहीं, बल्कि यह होता था कि वह आई कब चली कब,पहुंची कब और मरीज अस्पताल पहुंचा कब। अब इन प्रश्नों के उत्तर जीपीएस और एनएचएआई केयर सिस्टम के डिजिटल रिकॉर्ड से निकाले जा सकेंगे। एनएचएआई ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगभग 3,000 एंबुलेंस तथा लगभग 1,000 पेट्रोलिंग वाहन और क्रेन तैनात होने की जानकारी दी है, जो लगभग 50,000 किलोमीटर के हाईवे नेटवर्क को कवर करते हैं।
साथयों बात अगर हम देरी पर जुर्माना:अब ट्रैफिक में फंसे थे वाला बहाना नहीं चलेगा इसको समझने की करें तो, नई व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकीअकाउंटेंबिलिटी आर्किटेक्चर है। दुर्घटनास्थल तक निर्धारित समय में नहीं पहुंचने पर 10,000 रूपए तक की पेनल्टी का प्रावधान है।यदि आपातकालीन टिकट स्वीकार करने में एक मिनट से अधिक की देरी होती है तो अतिरिक्त देरी पर 5,000 रूपए प्रति मिनट या उसके हिस्से के हिसाब से दंड लगाया जा सकता है। इसी प्रकार टिकट स्वीकार करने के बाद एंबुलेंस के दो मिनट के भीतर रवाना न होने पर भी अतिरिक्त देरी के लिए दंड निर्धारित है। किसी आपातकालीन टिकट को अस्वीकार करना भी गंभीर उल्लंघन माना गया है और इसके लिए 10,000 रूपए प्रति घटना की पेनल्टी का प्रावधान बताया गया है। घायल को निर्धारित एक घंटे में निकटतम अस्पताल तक न पहुंचाने पर भी 10,000 रूपए का दंड लगाया जा सकता है। यानें अब एंबुलेंस सेवा में कॉल आया था लेकिन ड्राइवर उपलब्ध नहीं था, लोकेशन नहीं मिली, ट्रैफिक बहुत था,कॉल देर से मिला जैसे मौखिक स्पष्टीकरणों की जगह डिजिटल रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होगा। एनएचएआई केयर डैशबोर्ड और जीपीएस यह दर्ज कर सकते हैं कि टिकट कब बना, कब स्वीकार हुआ, वाहन कब चला, कितनी दूरी तय की और अस्पताल कब पहुंचाया गया। यही वह परिवर्तन है जो किसी सरकारी या अनुबंधित सेवा को महज सुविधा से उठाकर जवाबदेह सार्वजनिक सेवा में बदलता है।
साथियों बात अगर हम जीपीएस एआईएस -140 और मोबाइल डेटा: हाईवे एंबुलेंस अब डिजिटल निगरानी में, इसको समझने की करें तो इस पूरी व्यवस्था का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ तकनीक है।एनएचएआई के अनुसार उसके ऑन-रोड यूनिट्स में एआईएस-140 कम्प्लीट जीपीएस डिवाइसस लगाए गए हैं। एंबुलेंस, क्रेन और पेट्रोलिंग वाहनों के साथ एंड्राइड आधारित मोबाइल डेटा टर्मिनल और एलओं टी सिम की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य केवल वाहन की लोकेशन जानना नहीं, बल्कि इंसिडेंट मैनेजमेंट सिस्टम को वास्तविक समय का डेटा उपलब्ध कराना है। इसका अर्थ है कि हाईवे पर दुर्घटना की सूचना मिलते ही पूरा घटनाक्रम डिजिटल रूप से दर्ज किया जा सकता है। एनएचएआई का 1033 हेल्पलाइन सिस्टम पहले से ही राष्ट्रीय राजमार्गों पर दुर्घटनाओं और अन्य समस्याओं की सूचना लेने के लिए 24×7 व्यवस्था के रूप में विकसित किया गया है। एनएचएआई के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार 1033 के माध्यम से दुर्घटना की सूचना मिलने पर संबंधित इंसिडेंट मैनेजमेंट कंट्रोल सेंटर एंबुलेंस, पेट्रोलिंग वाहन और क्रेन जैसी सहायता भेज सकता है।इसलिए किसी हाईवे यात्री के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश सरल है दुर्घटना दिखे तो 1033 पर सूचना दें, सही लोकेशन बताएं और सहायता आने तक सुरक्षित तरीके से स्थिति पर नजर रखें।
साथियों गोल्डन ऑवर वास्तव में जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी है।सड़क दुर्घटना के बाद पहला एक घंटा चिकित्सा विज्ञान और सड़क सुरक्षा नीति दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार बड़ी संख्या में सड़क़ दुर्घटना पीड़ित समय पर चिकित्सा सहायता मिलने से बचाए जा सकते हैं; मंत्रालय की गुड स्मार्टीयन जानकारी भी बताती है कि दुर्घटना के बाद पहले घंटे में चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना निर्णायक हो सकता है। मिनिस्ट्री ऑफ़ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवेज यहीं एनएचएआई की नई व्यवस्था का वास्तविक महत्व समझ में आता है। यदि एंबुलेंस 10 मिनट में घटनास्थल पहुंचती है और अगले चरण में घायल को निर्धारित समय के भीतर अस्पताल पहुंचाया जाता है तो चिकित्सा प्रणाली के पास मरीज को स्थिर करने, रक्तस्राव रोकने, ऑक्सीजन देने, फ्रैक्चर को स्थिर करने और आवश्यक जीवनरक्षक उपचार शुरू करने का बेहतर अवसर रहता है। इसलिए 10 मिनट केवल एक प्रशासनिक संख्या नहीं,बल्कि सटीकता से जीवन बचाने की रणनीति है।
साथियों सवाल सिर्फ एंबुलेंस का नहीं अस्पताल तक सही पहुंच का भी है इसको समझने की करें तो,दुर्घटना के बाद एक दूसरी बड़ी समस्या यह रही है कि घायल व्यक्ति को हमेशा सबसे नजदीकी उपयुक्त अस्पताल नहीं पहुंचाया जाता। नई व्यवस्था में टिकट स्वीकार होने के बाद एक घंटे के भीतर निकटतम अस्पताल पहुंचाने का लक्ष्य इसी समस्या को संबोधित करता है। इससे अनावश्यक लंबी दूरी, निजी अस्पताल चुनने में देरी अथवा अन्य गैर-चिकित्सीय कारणों से समय बर्बाद होने की संभावना कम की जा सकती है। लेकिन यहां यह भी समझना जरूरी है कि ‘निकटतम अस्पताल’ और उपयुक्त ट्रॉमा सेंटर हमेशा एक ही चीज नहीं होते। इसलिए भविष्य की व्यवस्था में अस्पतालों को भी ट्रॉमा क्षमता, आईसीयु ,ऑपरेशन सुविधा, रक्त की उपलब्धता और विशेषज्ञ चिकित्सकों के आधार पर डिजिटल रूप से वर्गीकृत करना होगा। केवल मरीज को जल्दी अस्पताल पहुंचाना पर्याप्त नहीं; सही मरीज को सही क्षमता वाले अस्पताल तक जल्दी पहुंचाना सटीकता से असली लक्ष्य होना चाहिए।
साथियों बात अगर हम लापरवाही केवल एंबुलेंस की नहीं, इंफ्रास्ट्रक्चर भी जिम्मेदार इसको समझने की करें तो, राष्ट्रीय राजमार्गों पर दुर्घटनाओं के पीछे केवल चालक की गलती या एंबुलेंस की देरी को जिम्मेदार ठहराना अधूरा विश्लेषण होगा। सड़क की डिजाइन, ब्लैक स्पॉट, खराब रोशनी, अवैध पार्किंग, गलत कट, सर्विस रोड की कमी, टोल प्लाजा पर जाम, सड़क किनारे खड़े भारी वाहन और अपर्याप्त मोबाइल नेटवर्क जैसी समस्याएं भी इमरजेंसी रिस्पांस टाइम को प्रभावित करती हैं।यदि एंबुलेंस 10 मिनट में निकल भी जाए लेकिन रास्ते में ट्रक खड़े हों,टोल प्लाजा पर अवरोध हो या दुर्घटना की लोकेशन स्पष्ट न हो, तो लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा। इसलिए एनएचएआई की नई नीति को रोड इंजीनियरिंग +ट्रैफिक मैनेजमेंट+इमरजेंसी मेडिकल रिस्पांस के संयुक्त मॉडल के रूप में लागू करना होगा। केवल एंबुलेंस पर दंड लगाकर सड़क सुरक्षा का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।जनता का डर भी मौत का कारण सटीकता से नहीं बनना चाहिए।
साथियों बात अगर हम भारत में सड़क दुर्घटना के बाद सबसे बड़ी सामाजिक समस्याओं में से एक है,कौन पुलिस के चक्कर में पड़े? इसको समझने की करें तो यह मानसिकता बदलना आवश्यक है। इसके लिए भारत में गुड स्मार्टीयन यानी ‘नेक मददगार’ के अधिकारों को कानूनी संरक्षण दिया गया है।मोटर व्हीकलस
(अमेन्डमेंट) एक्ट ,2019 ने धारा134 ए के माध्यम से गुड समारिटेंस की सुरक्षा का प्रावधान किया। सद्भावना से दुर्घटना पीड़ित की सहायता करने वाले व्यक्ति को केवल सहायता करने के कारण नागरिक या आपराधिक कार्रवाई के भय में नहीं रहना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी गुड स्मार्टीयन के संबंध में महत्वपूर्ण सुरक्षा निर्देशों को मंजूरी दी है। ऐसे मददगार को अनावश्यक रूप से पुलिस पूछताछ में रोकना, पहचान बताने के लिए मजबूर करना या बार-बार अदालत में बुलाना व्यवस्था का उद्देश्य नहीं है। 2020 में केंद्र सरकार ने गुड समेरिटन प्रोटेक्शन रूल्स को औपचारिक रूप से अधिसूचित भी किया।
इसलिए अब समाज को यह संदेश स्पष्ट रूप से देना होगा घायल की मदद करना कानूनी मुसीबत मोल लेना नहीं, बल्कि कानून द्वारा संरक्षित मानवीय कर्तव्य है।एंबुलेंस को रास्ता देना भी कानूनी जिम्मेदारी है।मोटर व्हीकलस (अमेन्डमेंट )एक्ट ,2019 ने आपातकालीन वाहनों को रास्ता न देने को गंभीर यातायात उल्लंघन बनाया है।धारा 194 ई के तहत एंबुलेंस,फायर ब्रिगेड या अन्य निर्धारित आपातकालीन वाहन को रास्ता न देने पर 10,000 रूपए का जुर्माना निर्धारित है। गुड स्मार्टीयन से राह-वीर तक:समाज को दर्शक से जीवनरक्षक बनाना होगा।यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सुधारना भी जरूरी है। पहले गुड समारेरिटन योजना में 5,000 रूपए पुरस्कार का प्रावधान था, लेकिन बाद में राह-वीर योजना के अंतर्गत पुरस्कार बढ़ाकर 25,000 रूपए किया गया है। सरकारी दस्तावेजों में भी इस संशोधित व्यवस्था का उल्लेख है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि सड़क दुर्घटना को पूरी तरह समाप्त करना शायद संभव न हो,लेकिन दुर्घटना के बाद होने वाली दूसरी मौत यानी समय पर इलाज न मिलने से होने वाली मौत को बहुत हद तक रोका जा सकता है। एनएचएआई के नए नियम इसी सोच को संस्थागत रूप देने की कोशिश हैं।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318