मुकेश तिवारी
बरेली। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता की आवाज होती है और जब यह आवाज छात्रों और युवाओं के माध्यम से उठती है, तो उसका प्रभाव दूरगामी होता है। नीट पेपर लीक के मुद्दे पर चले लंबे आंदोलन और उसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को कई लोग छात्र शक्ति की बड़ी राजनीतिक और नैतिक जीत के रूप में देख रहे हैं। यह घटनाक्रम केवल एक मंत्री के पद छोड़ने तक सीमित नहीं है बल्कि शासन की जवाबदेही, लोकतांत्रिक अधिकारों और युवाओं की राजनीतिक चेतना पर भी गंभीर चर्चा का विषय है।
देश का युवा वर्ग आज केवल रोजगार या शिक्षा की मांग करने वाला वर्ग नहीं रह गया है। वह अपने अधिकारों के प्रति सजग है और व्यवस्था से पारदर्शिता तथा जवाबदेही की अपेक्षा करता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसी घटनाएं केवल परीक्षा प्रणाली की विफलता नहीं हैं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के सपनों और वर्षों की मेहनत पर सीधा आघात हैं। ऐसे में यदि छात्र सड़कों पर उतरते हैं, शांतिपूर्ण आंदोलन करते हैं और सरकार से जवाब मांगते हैं, तो यह लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा का हिस्सा है।
जंतर- मंतर पर चला आंदोलन इस बात का प्रतीक बना कि लोकतंत्र में संवाद और जनदबाव की अपनी ताकत होती है। यदि किसी आंदोलन के कारण सत्ता को अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करना पड़ता है, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की सक्रियता का भी संकेत है। इतिहास गवाह है कि चाहे स्वतंत्रता आंदोलन रहा हो, जेपी आंदोलन हो या किसान आंदोलन, संगठित जनशक्ति ने समय-समय पर सरकारों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार के लिए विवश किया है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी भी लोकतंत्र में आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार होना चाहिए। यदि इस्तीफे के बाद भी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता नहीं आती, पेपर लीक का नेटवर्क समाप्त नहीं होता और युवाओं का भविष्य असुरक्षित बना रहता है, तो केवल राजनीतिक जिम्मेदारी तय कर देना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक सफलता तब होगी जब भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं को पूरी तरह निष्पक्ष, तकनीक-सक्षम और भ्रष्टाचारमुक्त बनाया जाएगा।
भारत विश्व का सबसे युवा देशों में से एक है। करोड़ों युवाओं की आकांक्षाएं देश की सबसे बड़ी पूंजी हैं। यह पीढ़ी भावनाओं से अधिक तथ्यों, तकनीक और तर्क पर विश्वास करती है। इसे दबाने के बजाय इसके साथ संवाद स्थापित करना समय की आवश्यकता है। सरकारों को यह समझना होगा कि शिक्षा और रोजगार केवल चुनावी मुद्दे नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला हैं।
लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन जनता का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होता है। यदि युवा वर्ग को न्याय, पारदर्शिता और अवसर मिलेंगे, तो वही देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा। छात्र शक्ति ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि लोकतंत्र में जागरूक नागरिक और संगठित युवा परिवर्तन के सबसे प्रभावी वाहक हो सकते हैं। अब जिम्मेदारी सरकार की है कि वह इस संदेश को केवल राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधार के अवसर के रूप में स्वीकार करे।
*मुकेश तिवारी*
बरेली।
