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Article : छात्र आंदोलन,पुलिस बल प्रयोग और लोकतंत्र की कसौटी

Naya Savera Network

क्या शांतिपूर्ण विरोध पर लाठीचार्ज,पैलेट गन और एके-47 का इस्तेमाल संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप है? 

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा 28 जुलाई को सुनवाई -समग्र व्यापक विश्लेषण

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है,जहाँ असहमति व्यक्त करना, सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाना और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का अभिन्न अंग माना गया है।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम स्वयं इस सत्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि अहिंसक आंदोलन लोकतंत्र की सबसे शक्तिशाली अभिव्यक्ति हो सकते हैं। महात्मा गांधी के सत्याग्रह, असहयोग और भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरी दुनियाँ को यह संदेश दिया कि जनशक्ति और नैतिक बल किसी भी सत्ता से अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।आज जब 2026 में देश के विभिन्न भागों में पेपर लीक प्रकरण को लेकर छात्र सड़कों पर उतरे और विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा कथित लाठीचार्ज, पैलेट गन तथा बिहार के सीवान में एक पुलिसकर्मी द्वारा एके-47 के इस्तेमाल का वीडियो चर्चा का विषय बनातब पुलिस की बर्बरता की ओर जनता का ध्यान आकर्षित हुआ। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यह केवल कानून -व्यवस्था का प्रश्न नहीं रहा बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों,मानवाधिकारों और संवैधानिक उत्तरदायित्व की गंभीर परीक्षा बन गया है। 27 जुलाई 2026 को संसद के मानसून सत्र में एंटी- पेपर लीक (संशोधन) विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया गया जिसका उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाना और पेपर लीक जैसे अपराधों पर कठोर दंडात्मक प्रावधान लागू करना बताया गया।किंतु विधेयक पर विस्तृत चर्चा होने से पहले विपक्ष ने छात्र आंदोलनों पर पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया। संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हुई,जिसके परिणाम स्वरूप सदन की कार्यवाही पहले दोपहर तक, फिर दो बजे तक और उसके बाद शाम पाँच बजे तक स्थगित करनी पड़ी जो शायद मंगलवार तक स्थित हो सकती है।तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी को मानसून सत्र के शेष भाग के लिए निलंबित किए जाने से राजनीतिक तनाव और बढ़ गया। इससे स्पष्ट हुआ कि यह विवाद अब केवल कानून निर्माण का विषय नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श, नागरिक स्वतंत्रता और राज्य की जवाबदेही का राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। 
साथियों, लोकतंत्र में सरकार का यह दायित्व है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करे और हिंसा को रोके। वहीं नागरिकों का भी दायित्व है कि वे शांतिपूर्ण और कानून सम्मत तरीके से अपनी बात रखें। किंतु जब किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर बल प्रयोग के आरोप लगते हैं,तब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह बन जाता है कि क्या पुलिस की कार्रवाई आवश्यक, अनुपातिक और परिस्थितियों के अनुरूप थी? यदि प्रदर्शनकारी वास्तव में शांतिपूर्ण थे और उनके विरुद्ध अत्यधिक बल प्रयोग किया गया, तो यह न केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का विषय बनता है बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। दूसरी ओर यदि किसी प्रदर्शन में हिंसा, आगजनी या पुलिस पर हमले हुए हों, तो राज्य को न्यूनतम आवश्यक बल प्रयोग करने का अधिकार भी प्राप्त है।अतः किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले स्वतंत्र, निष्पक्ष और न्यायिक जांच आवश्यक है। 
साथियों, इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने इस पूरे मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली पीठ 28 जुलाई 2026 को उन सभी याचिकाओं पर संयुक्त रूप से विस्तृत सुनवाई करने वाली है,जिनमें दिल्ली में कथित पैलेट गन के इस्तेमाल,बिहार के सीवान में एके-47 के कथित उपयोग तथा प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई घटनाओं पर प्रश्न उठाए गए हैं। न्यायालय ने प्रारंभिक टिप्पणी में यह स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है और केवल प्रदर्शन होने मात्र से लाठी चार्ज या बल प्रयोग को स्वतः उचित नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही अदालत पुलिसकर्मियों पर कथित हमलों तथा कानून-व्यवस्था भंग करने के आरोपों से जुड़ी अन्य याचिकाओं पर भी विचार करेगी। इससे यह संदेश गया है कि न्यायपालिका दोनों पक्षों के दावों का निष्पक्ष परीक्षण करना चाहती है। 
साथियों दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीकप्रकरण को लेकर छात्रों का आंदोलन पिछले दिनों राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना था कि वे परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे थे। 20 जुलाई को पुलिस कार्रवाई के दौरान लाठीचार्ज होने और कथित रूप से पैलेट गन चलाए जाने की खबरें सामने आईं। कई छात्रों के घायल होने और अस्पताल में भर्ती होने के समाचारों ने जनमानस को झकझोर दिया। यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि पैलेट गन का प्रयोग वास्तव में हुआ और वह परिस्थितियों की आवश्यकता से अधिक था,तो यह पुलिस बल प्रयोग की नीति और मानवाधिकार मानकों पर गंभीर प्रश्न खड़े करेगा। वहीं यदि तथ्यों से भिन्न स्थिति सामने आती है, तो गलत सूचनाओं की जिम्मेदारी भी तय करना आवश्यक होगा। इसलिए सत्य तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता सटीकता से निष्पक्ष जांच ही है। 
साथियों, बिहार के सीवान जिले में 25 जुलाई को बिहार बंद के दौरान एक पुलिसकर्मी द्वारा कथित रूप से एके- 47 राइफल का इस्तेमाल करते हुए दिखाई देने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। इसके बाद संबंधित पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया गया। यह निलंबन स्वयं इस बात का संकेत है कि प्रशासन ने मामले को गंभीर माना है और जांच की आवश्यकता स्वीकार की है।हालांकि वीडियो की परिस्थितियाँ, हथियार का वास्तविक उपयोग,चेतावनी, फायरिंग की प्रकृति और घटनास्थल की स्थिति जैसे सभी पहलुओं की विधिवत जांच आवश्यक है। लोकतंत्र में किसी भी घटना का निर्णय केवल वायरल वीडियो के आधार पर नहीं बल्कि प्रमाण, वैज्ञानिक जांच और न्यायिक परीक्षण के आधार पर होना चाहिए। 
साथियों, राजनीतिक प्रतिक्रिया भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पक्ष रही। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि छात्रों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया।कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद ने मीडिया से कहा कि यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल छात्राओं के परिवारों से पूछताछ की गई या प्रदर्शन को रोकने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग हुआ,तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों के विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि छात्र आतंकवादी नहीं हैं, इसलिए उनके विरुद्ध ऐसे हथियारों की आवश्यकता क्यों पड़ी। दूसरी ओर सरकार और पुलिस का पक्ष यह हो सकता है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा किसी संभावित हिंसक स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए। इन दोनों दावों के बीच वास्तविक सत्य का निर्धारण केवल स्वतंत्र जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही संभव है। 
साथियों, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने तथा अपनी बात रखने का अधिकार देता है। यह अधिकार पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था,सुरक्षा तथा संप्रभुता के हित में उस पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। किंतु सर्वोच्च न्यायालय समय-समय पर यह स्पष्ट करता रहा है कि किसी भी प्रतिबंध या पुलिस कार्रवाई का आधार आवश्यकता, वैधता और अनुपातिकता होना चाहिए। अर्थात यदि कम कठोर उपायों से स्थिति नियंत्रित की जा सकती थी,तो अत्यधिक बल प्रयोग को उचित नहीं माना जा सकता।अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानक भी इसी सिद्धांत का समर्थन करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के कानून- प्रवर्तन अधिकारियों के लिए निर्धारित मूल सिद्धांतों के अनुसार बल का प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए और वह भी न्यूनतम आवश्यक सीमा तक। घातक हथियारों का उपयोग केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में, जब जीवन की रक्षा का कोई अन्य उपाय न हो, तभी किया जाना चाहिए। यही कारण है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस प्रशिक्षण, भीड़ नियंत्रण की आधुनिक तकनीक और जवाबदेही की व्यवस्था पर विशेष बल दिया जाता है। 
साथियों, पेपर लीक जैसी घटनाएँ देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़ी होती हैं। जब वर्षों की मेहनत एक संगठित अपराध के कारण प्रभावित होती है, तब युवाओं में आक्रोश स्वाभाविक है। सरकार द्वारा एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक, 2026 लाना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा सकता है। किंतु कानून जितना कठोर होगा,उसका क्रियान्वयन उतना ही पारदर्शी और निष्पक्ष होना चाहिए। यदि परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करना है, तो केवल दोषियों को दंडित करना ही पर्याप्त नहीं होगा; युवाओं का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास भी मजबूत करना होगा। 
साथियों, इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि लोकतंत्र में विरोध और व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सरकार को यहसुनिश्चित करना होगा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो, वहीं प्रदर्शनकारियों को भी यह समझना होगा कि सार्वजनिक संपत्ति की क्षति, हिंसा या पुलिस पर हमला किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करता है। संवाद, मध्यस्थता और विश्वास-निर्माण की प्रक्रिया बल प्रयोग से कहीं अधिक प्रभावी और स्थायी समाधान प्रदान कर सकती है।अब पूरे देश की निगाहें 28 जुलाई 2026 को होने वाली सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई पर टिकी हैं। न्यायालय के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होगा कि क्या पुलिस की कार्रवाई संवैधानिक मानकों के अनुरूप थी, क्या बल प्रयोग परिस्थितियों की दृष्टि से आवश्यक और अनुपातिक था, तथा क्या किसी पक्ष द्वारा कानून का उल्लंघन हुआ। न्यायालय का निर्णय न केवल इस प्रकरण के लिए बल्कि भविष्य में छात्र आंदोलनों, नागरिक विरोध प्रदर्शनों और पुलिस कार्रवाई के मानकों के लिए भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है। 
*-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*
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