मातृशक्ति, परिवार,युवा और जनभागीदारी के बल पर नशे के खिलाफ़ राष्ट्रीय महाअभियान -समग्र व्यापक विश्लेषण
गोंदिया - वैश्विक स्तरपर इक्कीसवीं सदी में नशा और मादक पदार्थों का अवैध व्यापार केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह गया है,बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य,पारिवारिक सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण,युवा भविष्य,आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी बहु आयामी चुनौती बन चुका है। नशीले पदार्थों का जाल किसी एक व्यक्ति को प्रभावित करके नहीं रुकता, बल्कि धीरे-धीरे पूरे परिवार की आर्थिक स्थिरता, मानसिक शांति और सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रभावित करता है। जब किसी घर का युवा,पति,पिता, भाई या अन्य सदस्य नशे की गिरफ्त में आता है,तब उसका सबसे गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव अक्सर महिलाओं और बच्चों को झेलना पड़ता है।परिवार की आय नशे में खर्च होने लगती है,घरेलू तनाव बढ़ता है,बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है, मानसिक स्वास्थ्य पर दबाव पड़ता है और कई परिस्थितियों में घरेलू हिंसा तथा सामाजिक असुरक्षा का खतरा भी बढ़ जाता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र इस बात से पूर्णतः सहमत हूं क़ि नशे के विरुद्ध राष्ट्रीय रणनीति में महिलाओं को सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति के रूप में सामने लाने की आवश्यकता महत्वपूर्ण है क्योंकि माताएं, पत्नियां और बहनें नशे के दुष्प्रभाव को परिवार के भीतर सबसे निकट से देखती और महसूस करती हैं।एक मां अपने बच्चे के व्यवहार, मानसिक स्थिति और मित्र- मंडली में आए परिवर्तन को सबसे पहले पहचान सकती है।एक पत्नी परिवार की आय, घरेलू वातावरण और पति के स्वास्थ्य में हो रहे बदलावों को प्रत्यक्ष रूप से देखती है। एक बहन अपने भाई के जीवन में बढ़ती निराशा, हिंसक व्यवहार या गलत संगति को समय रहते समझ सकती है। इसलिए महिलाओं को केवल नशे की समस्या की पीड़ित या प्रभावित पक्ष के रूप में नहीं,बल्कि रोकथाम, पहचान, युद्ध नशेआं विरुद्ध से प्रधानमंत्री के कल कमलों द्वारा 2 अगस्त 2026 से शुरू होने वाले 100 सप्ताह के नशामुक्त भारत @ 2029 तक: मातृशक्ति,परिवार,युवा और जनभागीदारी के बल पर नशे के खिलाफ़ राष्ट्रीय महाअभियान -समग्र व्यापक विश्लेषण उपचार और पुनर्वास की अग्रिम पंक्ति की सामाजिक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करना चाहिए। यदि हर गांव,वार्ड और शहरी बस्ती में महिला समूहों को नशा-रोधी जागरूकता, प्रारंभिक पहचान, काउंसलिंग सहायता और सरकारी उपचार सेवाओं से जोड़ा जाए, तो नशे के विरुद्ध एक विशाल सामाजिक सुरक्षा-जाल तैयार किया जा सकता है।इसी व्यापक दृष्टि के संदर्भ में पंजाब में मुख्यमंत्री के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ युद्ध नशेआं विरुद्ध अभियान एक महत्वपूर्ण सामाजिक और प्रशासनिक प्रयोग के रूप में सामने आया है।
साथियों, पंजाब के युद्ध नशेआं विरुद्ध अभियान की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें कानून प्रवर्तन और सामाजिक सुधार को एक- दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक माना गया है। नशे की तस्करी करने वाले नेटवर्क केवल छोटे स्तर के विक्रेताओं तक सीमित नहीं होते; इनके पीछे आर्थिक लेन-देन, अंतरराज्यीय संपर्क डिजिटल संचार, अवैध संपत्तियां और संगठित अपराध की संरचनाएं हो सकती हैं। इसलिए तस्करों और उनके वित्तीय नेटवर्क के विरुद्ध एनडीपीएस कानून तथा अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के तहत प्रभावी जांच, संपत्ति की वैधानिक जब्ती,धन-शोधन की जांच और अंतरराज्यीय समन्वय आवश्यक है।लेकिन कठोर कार्रवाई हमेशा कानून न्यायिक प्रक्रिया और प्रमाण- आधारित जांच के दायरे में होनी चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नशे के विरुद्ध युद्ध का अर्थ कानून से ऊपर जाकर कार्रवाई नहीं, बल्कि कानून की प्रभावी, निष्पक्ष और पारदर्शी शक्ति का उपयोग है।
साथियों, युद्ध नशेआं विरुद्ध का सबसे बड़ा संदेश यह है कि नशे के खिलाफ संघर्ष केवल अपराध के विरुद्ध कार्रवाई नहीं, बल्कि परिवार को बचाने, महिलाओं को सशक्त बनाने, बच्चों के भविष्य की रक्षा करने और युवाओं की ऊर्जा को राष्ट्रनिर्माण की दिशा देने का अभियान है। माताएं, पत्नियां और बहनें इस लड़ाई की सबसे बड़ी नैतिक और सामाजिक शक्ति बन सकती हैं, क्योंकि वे परिवार की पीड़ा को समझने के साथ-साथ परिवर्तन की शुरुआत भी कर सकती हैं। जब परिवार नशे को केवल शर्म या बदनामी का विषय न मानकर उपचार योग्य समस्या के रूप में स्वीकार करेगा, जब सरकार उपचार और पुनर्वास को सुलभ बनाएगी, जब तस्करों के नेटवर्क पर कानून की कठोर कार्रवाई होगी और जब युवा नशामुक्त जीवन को विकसित भारत की जिम्मेदारी से जोड़ेंगे, तब यह अभियान वास्तविक जनआंदोलन बनेगा।
साथियों, महिलाओं की भागीदारी को राष्ट्रीय नीति में शामिल करने के लिए प्रत्येक जिले में नशामुक्त परिवार महिला शक्ति मंच स्थापित किया जा सकता है। स्वयं सहायता समूहों,आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं,आशासेविकाओं महिला मंडलों, शिक्षिकाओं, सामाजिक संगठनों और स्थानीय निकायों को इस अभियान से जोड़ा जा सकता है। इन समूहों का उद्देश्य किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पहचान उजागर करना या सामाजिक अपमान करना नहीं होना चाहिए, बल्कि परिवारों को गोपनीय और सुरक्षित सहायता उपलब्ध कराना होना चाहिए।मज़बूती से महिलाओं को यह प्रशिक्षण दिया जा सकता है कि नशे के शुरुआती संकेत क्या हैं, संकट की स्थिति में किस सरकारी केंद्र या हेल्पलाइन से संपर्क किया जाए, परिवार में संवाद कैसे बनाए रखा जाए और नशे से प्रभावित महिला या बच्चे की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। इस प्रकार मातृशक्ति को भावनात्मक प्रतीक के बजाय प्रशिक्षित सामाजिक भागीदार बनाया जा सकता है।नशे की समस्या का समाधान तभी संभव है जब आपूर्ति-श्रृंखला पर कठोर प्रहार, नशाग्रस्त व्यक्ति का वैज्ञानिक उपचार, परिवार की काउंसलिंग,सामाजिक पुनर्वास, युवाओं के लिए सकारात्मक अवसर और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को एकीकृत नीति के रूप में सटीकता से लागू किया जाए।
साथियों, परिवार की भूमिका उपचार के बाद और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। नशामुक्ति केवल कुछ दिनों या महीनों की चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है; यह व्यवहार, जीवनशैली सामाजिक वातावरण और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दीर्घकालिक यात्रा है। कई व्यक्ति उपचार के बाद पुराने मित्रों, तनावपूर्ण परिस्थितियों, बेरोजगारी, सामाजिक कलंक या नकारात्मक वातावरण के कारण दोबारा नशे की ओर लौट सकते हैं। इसलिए उपचार केंद्र से घर लौटने के बाद परिवार का सहयोग, नियमित काउंसलिंग, सकारात्मक संवाद और सामाजिक स्वीकार्यता अत्यंत आवश्यक है। यदि परिवार व्यक्ति को लगातार दोषी ठहराता रहे, उस पर अविश्वास करे या उसे सामाजिक रूप से अलग कर दे, तो पुनर्वास कठिन हो सकता है। इसके विपरीत, यदि परिवार उसे सम्मान, जिम्मेदारी, रोजगार, शिक्षा और स्वस्थ सामाजिक वातावरण से जोड़े, तो नशामुक्त जीवन को स्थायी बनाने में सहायता मिलती है। इसीलिए सरकारी नशामुक्ति केंद्रों में केवल मरीज की नहीं, बल्कि माता-पिता, पति-पत्नी और अन्य परिजनों की फैमिली काउंसलिंग को भी संस्थागत रूप से मजबूत किया जाना चाहिए।
साथियों, राष्ट्रीय स्तर पर नशे के विरुद्ध अभियान को नई गति देने के लिए “नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत” की अवधारणा विशेष महत्व रखती है। सरकारी पहल के अनुसार यह अभियान युवाओं को नशे से दूर रखते हुए उन्हें विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय लक्ष्य से जोड़ने का प्रयास है। हाल की आधिकारिक पहलों में इस विषय को युवा-नेतृत्व वाले सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित करने, राष्ट्रीय सहभागिता बढ़ाने और विभिन्न संस्थाओं को जोड़ने पर बल दिया गया है। यदि बड़ी संख्या में युवा एक साथ नशामुक्ति की शपथ लेते हैं, तो उसका वास्तविक प्रभाव केवल शपथ-समारोह तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रत्येक शपथ को स्थानीय कार्ययोजना से जोड़ना होगा जैसे स्कूल और कॉलेज में नशा-रोधी क्लब, खेल गतिविधियां,मानसिक स्वास्थ्य सहायता, सहपाठी परामर्श, डिजिटल जागरूकता और नशे से प्रभावित युवाओं के लिए उपचार तक सटीकता से पहुंच।
साथियों, भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी जनशक्ति है। यदि युवा नशे, अवसाद, बेरोजगारी और सामाजिक निराशा के जाल में फंसते हैं, तो इसका प्रभाव उत्पादकता, शिक्षा, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय विकास पर पड़ता है। दूसरी ओर, यदि युवाओं को खेल,कौशल, नवाचार, उद्यमिता,संस्कृति और सामुदायिक सेवा के अवसर मिलते हैं, तो उनकी ऊर्जा राष्ट्रनिर्माण की दिशा में आगे बढ़ सकती है। इसीलिए नशामुक्ति अभियान को केवल नशा मत करो जैसे संदेश तक सीमित नहीं रखना चाहिए। युवाओं को यह भी बताना होगा कि नशे से दूर रहकर वे कौन-से सकारात्मक अवसर प्राप्त कर सकते हैं। खेल मैदान,पुस्तकालय, कौशल केंद्र,रोजगार सहायता, सांस्कृतिक मंच और डिजिटल नवाचार केंद्र नशा-रोधी नीति के अप्रत्यक्ष लेकिन प्रभावी उपकरण सटीकता से बन सकते हैं।
साथियों, पंजाब मॉडल के राष्ट्रीय विस्तार के लिए त्रि- आयामी रणनीति अपनाई जा सकती है प्रवर्तन, उपचार और जन-सहयोग। पहला स्तंभ होगा तस्करी और संगठित अपराध के विरुद्ध कठोर तथा कानूनी कार्रवाई; दूसरा स्तंभ होगा नशे से प्रभावित व्यक्तियों के लिए सुलभ, वैज्ञानिक और सम्मानजनक उपचार; और तीसरा स्तंभ होगा परिवार, महिलाओं, युवाओं, स्कूलों, धार्मिक- सामाजिक संस्थाओं तथा स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी। इन तीनों स्तंभों के बीच संतुलन आवश्यक है। केवल गिरफ्तारी से नशे की मांग समाप्त नहीं होगी और केवल उपचार से तस्करी के नेटवर्क नहीं टूटेंगे। केवल जागरूकता से भी समस्या का समाधान नहीं होगा यदि उपचार सेवाएं उपलब्ध न हों। इसलिए समग्र नीति ही सटीकता से स्थायी परिणाम दे सकती है।
साथियों, महाराष्ट्र में नशामुक्त मुंबई जन-जागरण जैसी पहलें इस बात का संकेत हैं कि राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नशा-रोधी मॉडल विकसित करने होंगे।महानगरों में रात्रिकालीन अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन नेटवर्क, सिंथेटिक ड्रग्स और छात्र-युवा समुदाय से जुड़े जोखिम अलग हो सकते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी, सीमावर्ती तस्करी, सामाजिक दबाव और उपचार सुविधाओं की कमी प्रमुख चुनौतियां हो सकती हैं। इसलिए राष्ट्रीय नीति एक समान लक्ष्य के साथ स्थानीय कार्ययोजनाओं को स्वीकार करे। महाराष्ट्र सरकार के सामाजिक न्याय विभाग द्वारा नशामुक्त भारत अभियान से संबंधित जनभागीदारी और शपथ जैसी पहलें भी इस दिशा में संस्थागत आधार प्रदान करती हैं।
साथियों,नशा मुक्त भारत @ 2029 को केवल एक समय- सीमा या सरकारी लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सामाजिक संकल्प के रूप में देखना चाहिए। सफलता का आकलन केवल जब्त किए गए नशीले पदार्थों या गिरफ्तारियों की संख्या से नहीं होना चाहिए। यह भी मापना होगा कि कितने लोग उपचार तक पहुंचे, कितने परिवारों को काउंसलिंग मिली, कितने युवा नशे से दूर रहे, कितने व्यक्ति पुनर्वास के बाद शिक्षा या रोजगार से जुड़े और कितने क्षेत्रों में नशे की उपलब्धता तथा मांग में वास्तविक कमी आई। हर राज्य को वार्षिक नशामुक्ति सामाजिक प्रगति रिपोर्ट जारी करनी चाहिए, जिसमें प्रवर्तन, स्वास्थ्य, पुनर्वास, महिला भागीदारी और युवा कार्यक्रमों के परिणाम पारदर्शी रूप से प्रस्तुत हों।
*-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*
