विश्व शिजोफ्रेनिया दिवस पर श्री कृष्णा न्यूरो एवं मानसिक रोग चिकित्सालय में हुई जागरूकता संगोष्ठी
जौनपुर। समाज में शिजोफ्रेनिया को लेकर तमाम भ्रांतियों और मिथकों की बात कही जा रही है। सबसे बड़ा मिथक यह है कि लोग इसे ऊपरी हवा का चक्कर, भूत-प्रेत का साया या कोई तांत्रिक प्रकोप मान लेते हैं जिसके चलते मरीज को ओझा-सोखा के पास ले जाते हैं। सच्चाई यह है कि शिजोफ्रेनिया कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि दिमाग के रसायनों (न्यूरो केमिकल्स जैसे डोपामाइन) के असंतुलन से होने वाली एक विशुद्ध मेडिकल कंडीशन है। उक्त बातें विश्व शिजोफ्रेनिया दिवस पर नगर के नईगंज में स्थित श्री कृष्णा न्यूरो एवं मानसिक रोग चिकित्सालय में आयोजित मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुये संगोष्ठी के मुख्य वक्ता, चिकित्सालय के प्रबन्ध निदेशक एवं वरिष्ठ न्यूरो-साइकियाट्रिस्ट डा. हरिनाथ यादव ने कही। उपस्थित जनसमुदाय, स्वास्थ्य कर्मियों एवं मरीजों के परिजनों को शिजोफ्रेनिया जैसी गम्भीर बीमारी के बारे में विस्तार से बताते हुये इसके प्रति समाज को जागरूक भी किया।
उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि दूसरा मिथक यह है कि शिजोफ्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति हमेशा हिंसक या पागल हो जाता है जबकि असलियत यह है कि सही देख—रेख मिलने पर ऐसे मरीज बेहद शान्त रहते हैं। वहीं तीसरा मिथक यह है कि यह बीमारी कभी ठीक नहीं हो सकती जबकि वैज्ञानिक सच यह है कि सही समय पर इलाज मिलने से मरीज पूरी तरह सामान्य जीवन जी सकता है। शिजोफ्रेनिया के लक्षणों पर प्रकाश डालते हुये डॉ. यादव ने बताया कि इसकी समय पर पहचान ही बचाव का पहला रास्ता है। इसके मुख्य लक्षणों में मरीज को ऐसी डरावनी या अजीब आवाजें सुनाई देती हैं जो हकीकत में होती ही नहीं हैं जिसे मेडिकल भाषा में हेलुसिनेशन कहते हैं। इसके अलावा मरीज के मन में बिना वजह पक्के शक पैदा हो जाते हैं। जैसे कोई उसके खिलाफ साजिश रच रहा है या उसके खाने में जहर मिला रहा है जिसे डेल्यूजन कहा जाता है। इस बीमारी में मरीज अचानक समाज और परिवार से पूरी तरह कट जाता है। खुद से ही अकेले में बूदबूदाता या हंसता रहता है। नहाने-धोने या साफ-सफाई पर ध्यान देना बन्द कर देता है और उसकी भावनाओं तथा बातचीत का तरीका पूरी तरह असंगत और अजीब हो जाता है।
उपचार एवं समाधान के बारे में डॉ. हरिनाथ ने कहा कि आधुनिक न्यूरो-साइकियाट्री में अब अत्यन्त प्रभावी एंटी-साइकोटिक्स दवाइयां मौजूद हैं जो दिमाग के रसायनों को संतुलित करती हैं। दवाओं के साथ थेरेपी और काउंसलिंग मरीज की सोच को सकारात्मक दिशा देने में रीढ़ की हड्डी का काम करती है। मरीज को समाज की मुख्य धारा में वापस लाने के लिए 'पुनर्वास' और उसे रचनात्मक कार्यों से जोड़ना बेहद जरूरी है, ताकि वह आत्मनिर्भर होकर गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सके। इस अवसर पर डा. सुशील, नितिन, शिव बहादुर, लालजी सहित समस्त हॉस्पिटल स्टाफ, मरीज, उनके परिजन आदि उपस्थित रहे।
अन्त में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डा. प्रतिमा यादव ने उपस्थित जनसमुदाय को सम्बोधित करते हुये शिजोफ्रेनिया मरीजों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार रखने की अपील किया। साथ ही उपस्थित लोगों को जागरूक होने के लिये बधाई देते हुये कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु सभी का धन्यवाद भी ज्ञापित किया।

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