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Jaunpur News :3,800 बच्चों की मुक्ति ने खोला बड़ा सवाल: बचपन बिक रहा है,कानून देख रहा है?

Naya Savera Network

ढाबों से कारखानों तक मासूम हाथों का शोषण; कानून मौजूद, कार्रवाई भी संभव, तो फिर बालश्रम खत्म क्यों नहीं?

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत जब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ने, रोजगार के नए अवसर पैदा करने और 2047 तक एक समृद्ध एवं न्यायपूर्ण समाज बनाने का संकल्प ले रहा है,तब उसके सामने एक ऐसा प्रश्न भी खड़ा है जिसे केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं टाला जा सकता,क्या देश का बचपन वास्तव में सुरक्षित है?भारत की सड़कों,चौराहों और चमचमाते महानगरों के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जो देश के आर्थिक महाशक्ति बनने के दावों को सीधे तौर पर चुनौती देता है।सड़क किनारे चाय की दुकान पर गिलास धोता बच्चा, ढाबे पर ग्राहकों को खाना परोसता छोटू, ट्रैफिक सिग्नल पर सामान बेचता मासूम,निर्माण स्थल पर ईंट ढोता बच्चा या किसी कारखाने में मशीनों के बीच काम करता नाबालिग केवल गरीबी की तस्वीर नहीं है; वह उस व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है, जिसमें कानून होने के बावजूद उसका प्रभावी क्रियान्वयन हर जगह दिखाई नहीं देता। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि 3,800 बच्चों की मुक्ति ने खोला बड़ा सवाल:बचपन बिक रहा है,कानून देख रहा है? :ढाबों से कारखानों तक मासूम हाथों का शोषण ;कानून मौजूद, कार्रवाई भी संभव,तो फिर बालश्रम खत्म क्यों नहीं?बच्चे मजदूर नहीं,भारत का भविष्य हैं:नक्सल मुक्त,नशामुक्त भारत की तरह  बालश्रम मुक्त भारत का संकल्प की डेट लाइन क्यों नहीं?बता दूँ क़ि शासकीय मीडिया में आई खबरों के अनुसार, इस सवाल को और गंभीर बना दिया है,दिनांक 4 सितंबर 2026 क़ो रिपोर्ट आई क़ि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के हालिया अभियान ने।महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तहत वैधानिक संस्था एनसीपीसीआर ने 12 जून 2026 से 31 अगस्त 2026 तक विशेष अखिल भारतीय बचाव और पुनर्वास अभियान चलाया। राज्य सरकारों, केंद्रशासित प्रदेशों, जिलाधिकारियों श्रम विभागों, पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय से चलाए गए इस अभियान में 3,800 से अधिक बच्चों को बालश्रम से मुक्त कराया गया और 575 से अधिक एफआईआर दर्ज हुईं।  यह आंकड़ा केवल सफलता की कहानी नहीं है; यह उस समस्या की गहराई का भी संकेत है, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में कानून की मौजूदगी के बावजूद बनी हुई है। 
साथियों, सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यहीं से जन्म लेता है,यदि लगभग ढाई महीने के लक्षित और सक्रिय अभियान में 3,800 से अधिक बच्चे मुक्त कराए जा सकते हैं, तो क्या ऐसी कार्रवाई पूरे वर्ष नियमित रूप से नहीं हो सकती? यदि प्रत्येक जिले में संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करके लगातार औचक निरीक्षण, गोपनीय सूचना तंत्र और बहु- विभागीय कार्रवाई की जाए, तो निश्चित रूप से बालश्रम के विरुद्ध कार्रवाई का दायरा बहुत बड़ा हो सकता है। एनसीपीसीआर के अभियान में भी जिलाधिकारियों,श्रम विभाग और पुलिस के साथ समन्वय तथा नियमित निगरानी को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी।इसलिए यह अभियान एक अस्थायी कार्रवाई भर न रहकर स्थायी जिला-स्तरीय प्रवर्तन मॉडल का आधार बन सकता है।बालश्रम की समस्या केवल ढाबों, चाय की दुकानों या छोटे कारखानों तक सीमित नहीं है। ईंट-भट्टों,निर्माण स्थलों,कृषि क्षेत्र,घरेलू काम,कचरा बीनने, कार्यशालाओं बाजारों, होटल- ढाबों,कारखानों और कुछ खतरनाक औद्योगिक गतिविधियों में भी बच्चों के शोषण का जोखिम मौजूद रहता है।विशेष रूप से प्रवासी परिवारों के बच्चों के मामले में समस्या और जटिल हो जाती है, क्योंकि उनका विद्यालय से जुड़ाव टूट सकता है और परिवार की आर्थिक मजबूरी उन्हें काम की ओर धकेल सकती है। बालश्रम इसलिए केवल श्रम कानून का विषय नहीं है; यह गरीबी, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, प्रवासन, मानव तस्करी और प्रशासनिक जवाबदेही इन सभी को सटीकता से जोड़ने वाला प्रश्न है। 
साथियों, यहीं रोजगार बाजार का एक चिंताजनक पहलू सामने आता है।बालश्रम सस्ता असंगठित और अधिकार -विहीन श्रम उपलब्ध कराता है।बच्चों को सामान्यतः संगठित श्रमिकों की तरह अपने अधिकारों, मजदूरी, कार्य -समय या श्रम-सुरक्षा की जानकारी नहीं होती और वे ट्रेड यूनियन जैसी सामूहिक संरचनाओं से भी जुड़े नहीं होते। इस कारण कुछ नियोक्ताओं के लिए उनका शोषण आर्थिक रूप से आकर्षक दिखाई दे सकता है। लेकिन किसी बच्चे की मजबूरी को सस्ता श्रम मान लेना केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि उसके शिक्षा, स्वास्थ्य, गरिमा और भविष्य पर हमला है।इस समस्या का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू प्रवर्तन की विश्वसनीयता है। किसी क्षेत्र में यदि कानून का उल्लंघन लंबे समय तक चलता रहे, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि निरीक्षण व्यवस्था कितनी प्रभावी है। हालांकि किसी विशेष अधिकारी या विभाग पर मिलीभगत अथवा भ्रष्टाचार का आरोप प्रमाण के बिना नहीं लगाया जाना चाहिए, लेकिन यदि शिकायतों के बावजूद बालश्रम लगातार दिखाई देता है, तो संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही तय करना आवश्यक है। नियमित निरीक्षण,शिकायतों की स्वतंत्र जांच, कार्रवाई की डिजिटल निगरानी और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा आकस्मिक निरीक्षण इस विश्वास को मजबूत कर सकते हैं कि कानून केवल कागज पर नहीं, जमीन पर भी सटीकता से लागू होता है। 
साथियों, इस संदर्भ में जिला कलेक्टर या जिला मजिस्ट्रेट की सक्रिय भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।प्रत्येक जिले में बालश्रम और बाल तस्करी के संभावित हॉटस्पॉट का मानचित्र तैयार किया जाए। पुलिस, श्रम विभाग, जिला बाल संरक्षण इकाई, बाल कल्याण समिति और विश्वसनीय नागरिक-संगठनों के बीच एक समन्वित तंत्र बनाया जाए। कार्रवाई से पहले सूचना लीक न हो, इसके लिए जोखिम-आधारित और गोपनीय निरीक्षण व्यवस्था विकसित की जा सकती है। प्रत्येक बचाव के बाद केवल एफआईआर दर्ज करके मामला समाप्त न हो; बच्चे की पहचान, परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुनर्वास और दोबारा बालश्रम में लौटने के जोखिम की भी सटीकता से निगरानी हो। 
साथियों, भारत के पास इस दिशा में महत्वपूर्ण कानूनी आधार पहले से मौजूद है। बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को रोजगार या काम में लगाने पर व्यापक प्रतिबंध है, जबकि 14 से 18 वर्ष के किशोरों को निर्धारित खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं में नियोजित करना प्रतिबंधित है। कानून में सीमित पारिवारिक सहायता से जुड़ा अपवाद है, लेकिन वह भी निर्धारित शर्तों के अधीन है और बच्चे की शिक्षा तथा गैर-खतरनाक गतिविधियों की सीमाओं से बंधा है। दंड के मामले में भी कानून कमजोर नहीं है। बच्चे को अवैध रूप से नियोजित करने पर नियोक्ता को छह महीने से दो वर्ष तक की जेल या 20,000 से 50,000 रूपए तक का जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान है। किशोर को प्रतिबंधित खतरनाक काम में लगाने पर भी समान दंडात्मक प्रावधान लागू होते हैं। दोबारा अपराध करने पर कानून अधिक कठोर सजा का प्रावधान करता है।  इसलिए वास्तविक चुनौती कानून की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि पकड़े जाने की निश्चितता,निष्पक्ष जांच अभियोजन और न्यायिक परिणाम की सटीकता से प्रभावशीलता है। 
साथियों संवैधानिक और शैक्षिक ढांचा भी स्पष्ट दिशा देता है। संविधान का अनुच्छेद 24 बच्चों को कुछ खतरनाक रोजगारों से सुरक्षा प्रदान करता है और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करता है। इसका मूल दर्शन सीधा है,बच्चे के हाथ में औजार नहीं, किताब होनी चाहिए। इसलिए बालश्रम के खिलाफ कार्रवाई तभी स्थायी होगी, जब बचाए गए बच्चे को केवल कार्यस्थल से हटाकर उसके भविष्य से जोड़ा जाए।यही कारण है कि पुनर्वास को बचाव जितना ही महत्वपूर्ण मानना होगा। बचाए गए बच्चे को बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत करना, परिवार की स्थिति का आकलन करना, शिक्षा से जोड़ना, आवश्यकतानुसार आवास, भोजन, स्वास्थ्य और मनोसामाजिक सहायता देना तथा आर्थिक पुनर्वास की निगरानी करना आवश्यक है। यदि बच्चे को आज दुकान से निकालकर कल उसी गरीबी में छोड़ दिया गया, तो वह किसी दूसरे नियोक्ता के पास फिर काम करने लग सकता है। अतः ‘रेस्क्यू’ को अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि पुनर्वास की पहली सीढ़ी माना जाना चाहिए। 
साथियों, डिजिटल व्यवस्था भी इस लड़ाई को अधिक पारदर्शी बना सकती है।श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अनुसार पेंसिल (प्लेटफार्म फॉर इफेक्टिव इनफ़ोर्समेंट फॉर नों चाइल्ड लेबर )पोर्टल पर बालश्रम संबंधी शिकायत दर्ज की जा सकती है और शिकायत संबंधित जिला नोडल अधिकारी तक कार्रवाई के लिए भेजी जाती है। मंत्रालय ने यह भी बताया है कि बालश्रम संबंधी शिकायत व्यवस्था को व्यापक बाल-सुरक्षा तंत्र के साथ जोड़ने की दिशा में काम किया जा रहा है।  अर्थात नागरिकों की शिकायत, प्रशासनिक कार्रवाई और पुनर्वास की जानकारी को एक डिजिटल निगरानी प्रणाली में जोड़ना भविष्य की प्रभावी व्यवस्था बन सकता है। 
साथियों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बालश्रम को केवल स्थानीय सामाजिक समस्या नहीं माना जाता। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओं) ने 12 जून 2026 के विश्व बालश्रम निषेध दिवस पर शिक्षा,सामाजिक सुरक्षा, गरिमापूर्ण वयस्क रोजगार, मजबूत कानून और प्रभावी प्रवर्तन को बालश्रम समाप्त करने के प्रमुख उपायों के रूप में रेखांकित किया।इसका अर्थ स्पष्ट है बालश्रम समाप्त करने के लिए केवल बच्चों को काम से हटाना पर्याप्त नहीं; वयस्कों को सम्मानजनक रोजगार, परिवारों को सामाजिक सुरक्षा और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देनी होगी।अब भारत के सामने एक बड़ा अवसर है। जिस तरह देश ने नशामुक्ति, मानव तस्करी, उग्रवाद और अन्य सामाजिक चुनौतियों के विरुद्ध लक्षित अभियानों और समयबद्ध कार्रवाई की दिशा में प्रयास किए हैं, उसी तरह बालश्रम मुक्त भारत को भी एक स्पष्ट राष्ट्रीय लक्ष्य बनाया जा सकता है। प्रत्येक जिले के लिए वार्षिक लक्ष्य, हॉटस्पॉट की सूची, नियमित औचक निरीक्षण, बचाव के बाद पुनर्वास की समयसीमा, एफआईआर और अभियोजन की स्थिति तथा अधिकारियों की जवाबदेही का सार्वजनिक डैशबोर्ड सटीकता से बनाया जा सकता है। 
साथियों सबसे बड़ी आवश्यकता सामाजिक मानसिकता बदलने की है। जब हम किसी बच्चे को ढाबे पर देखकर उसे छोटू कहकर बुलाते हैं,तब हमें यह याद रखना होगा कि वह किसी का नौकर नहीं, देश का भविष्य है। ग्राहक यदि बालश्रम को स्वीकार करना बंद कर दें, नियोक्ता कानून का भय महसूस करें,अधिकारी कार्रवाई को अपनी जिम्मेदारी समझें और समाज शिकायत करने को अपना नागरिक कर्तव्य माने, तो तस्वीर बदल सकती है।एनसीपीसीआर के 2026 अभियान के 3,800 से अधिक मुक्त बच्चों और 575 से अधिक एफआईआर को इसलिए केवल एक सरकारी उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक प्रयोगशाला-सरीखा प्रमाण है कि जब केंद्र, राज्य, जिला प्रशासन, पुलिस और श्रम तंत्र एक दिशा में सक्रिय होते हैं, तो परिणाम सामने आते हैं।  अब आवश्यकता इस मॉडल को अभियान से निकालकर निरंतर प्रशासनिक व्यवस्था बनाने की है। 

*-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*

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