जब तक हम आरक्षित वर्ग के भीतर छुपे हुए सबसे गरीब और हाशिए के व्यक्ति को सीधे तौर पर लक्षित करके लाभ नहीं पहुंचाएंगे, तब तक वैश्विक मंच पर असमानता कम करने का भारत का दावा अधूरा रहेगा -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया - वैश्विक स्तरपर हर देश आज आर्थिक प्रगति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता,डिजिटल क्रांति और वैज्ञानिक उपलब्धियों के नए दौर में प्रवेश कर चुका है,लेकिन विकास की इस चमक के पीछे असमानता की कई नई परतें उभर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र ने अगस्त 2026 के लिए सतत विकास लक्ष्य (एसडीज़ी)10 के तहत रिड्यूस्ड इनेक्वालिटीज को महीने का लक्ष्य (गोल ऑफ़ द मंथ) घोषित करनेकी आधिकारिक जानकारी 3 अगस्त 2026 को अपनी आधिकारिक संयुक्त राष्ट्र सतत विकास वेबसाइट (यू एन गोल ऑफ़ द मंथ) पर अपडेट की है संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-10, रिड्यूस्ड इनेक्वालिटीज अर्थात असमानताओं में कमी, का उद्देश्य केवल आय का अंतर घटाना नहीं, बल्कि सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक समावेशन को मजबूत करना तथा सभी लोगों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना है।संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि असमानता दीर्घकालीन सामाजिक एवं आर्थिक विकास को कमजोर कर सकती है,गरीबी उन्मूलन की गति को प्रभावित कर सकती है और लोगों में अवसरों तथा संस्थाओं के प्रति विश्वास को कम कर सकती है।यह घोषणा एक ऐसे मोड़ पर हुई है जब संपूर्ण विश्व आर्थिक विषमता, सामाजिक ध्रुवीकरण और संसाधनों के असमान वितरण जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। संयुक्त राष्ट्र का यह विज़न स्पष्ट रूप से मांग करता है कि दुनियाँ का प्रत्येक राष्ट्र अपनी आंतरिक नीतियों की समीक्षा करे,ताकि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े अंतिम व्यक्ति (वंचित वर्ग) को विकास की मुख्यधारा में शामिल किया जासके। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि संयुक्त राष्ट्र आमतौर पर प्रत्येक नए महीने के पहले या शुरुआती दिनों (जैसे 1 से 3 तारीख के बीच) में उस महीने के विशेष वैश्विक अभियान या गोल ऑफ़ द मंथ की विस्तृत रिपोर्ट और घोषणा जारी करता है, इस बार अगस्त 2026 के इस विशेष अभियान को 3 अगस्त 2026 को पूर्ण विवरण (आंकड़ों और वैश्विक प्राथमिकताओं) के साथ सार्वजनिक किया गया है,जब हम इस अंतर्राष्ट्रीय प्रतिमान को भारतीय धरातल पर क्रियान्वित होते देखते हैं, तो हमारा ध्यान सीधे तौर पर भारत की सबसे संवेदनशील और ऐतिहासिक नीति आरक्षण प्रणाली (रिजर्वेशन सिस्टम) की ओर जाता है। वर्तमान में,वैश्विक समानता के इस आह्वान के समानांतर, भारत के डिजिटल और सामाजिक पटल पर आरक्षण हटाओ आंदोलन जैसी मुहिम अत्यधिक तीव्रता से उभर रही हैं। यह अंतर्विरोध इस बात का जीवंत प्रमाण है कि देश में सामाजिक न्याय के पारंपरिक औजारों और आधुनिक आर्थिक वास्तविकताओं के बीच एक गहरी वैचारिक खाई उत्पन्न हो चुकी है।
साथियों, आरक्षण की संवैधानिक अवधारणा को समझे बिना इस प्रश्न का संतुलित उत्तर संभव नहीं है। भारत में आरक्षण का उद्देश्य किसी वर्ग को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक बहिष्कार,भेदभाव और अवसरों की असमानता से प्रभावित समुदायों को शिक्षा, सरकारी रोजगार और प्रतिनिधित्व में आगे बढ़ने का अवसर देना था।भारतीय संविधान की समानता संबंधी व्यवस्था केवल औपचारिक समानता तक सीमित नहीं है; वह वास्तविक और सार्थक समानता की दिशा में भी विशेष प्रावधानों की अनुमति देती है।अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपायों का उद्देश्य उन बाधाओं को कम करना था, जिनके कारण अनेक समुदाय लंबे समय तक शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक प्रतिष्ठा से दूर रहे।
साथियों, सत्तर वर्षों की यात्रा और आरक्षण की वर्तमान प्रासंगिकता भारतीय स्वतंत्रता के सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद, यह प्रश्न पूरी तरह से अपरिहार्य हो चुका है कि क्या आज भी आरक्षण की वास्तविक रूप में आवश्यकता है? इस विमर्श को समझने के लिए भारतीय समाज की ऐतिहासिक संरचना औरसमकालीन प्रगति दोनों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना अनिवार्य है। आरक्षण नीति को भारतीय संविधान में एक निश्चित अवधि के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व के रूप में और सामाजिक- शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए एक 'सकारात्मक कार्रवाई के तौर पर शामिल किया गया था। इस व्यवस्था ने निश्चित रूप से पिछले 70 वर्षों में देश के एक बहुत बड़े शोषित, वंचित और हाशिए पर पड़े समाज को प्रशासनिक, शैक्षणिक और राजनैतिक व्यवस्था में अपनी आवाज उठाने की शक्ति प्रदान की है। इस नीति के बिना भारतीय लोकतंत्र शायद इतना समावेशी नहीं हो पाता। परंतु, समस्या तब उत्पन्न होती है जब सत्तर वर्षों के बाद भी समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी उसी आदिम पिछड़ेपन, निरक्षरता और घोर सामाजिक अभाव में जीने के लिए विवश है। यह जमीनी हकीकत इस बात की ओर इशारा करती है कि आरक्षण नीति अपने मूल उद्देश्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में कहीं न कहीं आंशिक रूप से ही सफल रही है। यही कारण है कि आज की युवा पीढ़ी और आधुनिक विचारक इस नीति की निरंतरता औरइसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
साथियों, प्रशासनिक अभिजात्य वर्ग और पीढ़ी-दर- पीढ़ी लाभ का संकट इस संपूर्ण विमर्श के केंद्र में सबसे ज्वलंत और तीखा प्रश्न यह है कि क्या जो लोग आरक्षण के बल पर समाज के शीर्ष पायदान पर पहुंच चुके हैं,जैसे कि आईएएस आईपीएस, केंद्रीय सेवाओं के उच्च अधिकारी, बड़े राजनेता और आर्थिक रूप से अत्यधिक संपन्न हो चुके उद्योगपति,क्या उनकी अगली पीढ़ियों को भी इस सुरक्षा कवच की आवश्यकता है? सोशल मीडिया और वर्तमान बौद्धिक विमर्शों में इस बात को लेकर तीव्र आक्रोश है कि आरक्षण का लाभ एक ही परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हो रहा है। जब अनुसूचित जाति या जनजाति का कोई व्यक्ति सिविल सेवा के सर्वोच्च पद पर पहुंच जाता है, तो उसकी आने वाली संतति को देश के सबसे महंगे कॉन्वेंट स्कूलों, महानगरों के उच्च बुनियादी ढांचों और समस्त आर्थिक सुख-सुविधाओं का स्वतः लाभ मिल जाता है। ऐसे में,उस संपन्न बच्चे की तुलना उसी की श्रेणी के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले किसी खेतिहर मजदूर,हाथ से मैला उठाने वाले या किसी सुदूर आदिवासी अंचल के बच्चे से करना पूर्णतः अतार्किक और अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है। वास्तव में, इस नीतिगत विसंगति के कारण आरक्षित श्रेणियों के भीतर ही एक अभिजात्य वर्ग या क्रीमी लेयर का निर्माण हो गया है, जो अपनी ही जाति के सबसे गरीब, शोषित और अत्यंत पिछड़े लोगों के अधिकारों पर सटिकता से एकाधिकार जमाए बैठा है?
साथियों, सामाजिक,आर्थिक और नैतिक विषमता को बढ़ावा वर्तमान आरक्षण प्रणाली के इस रूप से समाज में एक नए प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और नैतिक विषमता को बढ़ावा मिल रहा है, जो कि संयुक्त राष्ट्र के एसडीज़ी 10 के सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है। सामाजिक स्तर पर, यह व्यवस्था जातियों के बीच सद्भाव पैदा करने के बजाय वैमनस्य और विभाजन को गहरा कर रही है। जब योग्यता रखने वाले सामान्य वर्ग के युवाओं को अत्यधिक उच्च अंक प्राप्त करने के बाद भी रोजगार या शिक्षा से वंचित होना पड़ता है, और उनकी तुलना में अत्यधिक संपन्न पृष्ठभूमि वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों का चयन बहुत कम अंकों पर हो जाता है, तो समाज में असंतोष और मानसिक कुंठा का जन्म होता है। आर्थिक स्तर पर, यह विषमता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि आरक्षण का आधार आज भी मुख्य रूप से केवल जन्मगत जाति बना हुआ है, न कि व्यक्ति की वर्तमान आर्थिक विपन्नता। नैतिक दृष्टिकोण से भी यह एक गंभीर संकट है। नीतिपरकता यह मांग करती है कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को पहले सहारा दिया जाए। परंतु, वर्तमान व्यवस्था में नैतिक रूप से संपन्न हो चुके परिवारों द्वारा स्वेच्छा से इस लाभ का परित्याग न करना और राज्य द्वारा इस पर कोई कठोर सीमा न लगाना, उस अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के प्रति घोर नैतिक अन्याय है, जो आज भी प्राथमिक शिक्षा और दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है।
साथियों, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिमान और सकारात्मक नीतिगत सुधारों की आवश्यकता अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर जब हम सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं, तो संयुक्त राष्ट्र का स्पष्ट मत है कि कोई भी सकारात्मक कार्रवाई शाश्वत या अपरिवर्तनीय नहीं हो सकती। उसे समय-समय पर व्यावहारिक डेटा, समकालीन सामाजिक विकास और आर्थिक पैमानों पर कसा जाना चाहिए।भारत के संदर्भ में भी, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया ऐतिहासिक निर्णयों में बार-बार इस बात पर बल दिया है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के भीतर भी क्रीमी लेयर के सिद्धांत को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, जातियों के उप-वर्गीकरण की प्रक्रिया को अपनाना अत्यंत अनिवार्य हो चुका है। उप- वर्गीकरण का तात्पर्य यह है कि आरक्षित श्रेणियों के भीतर जो जातियां पिछले 70 वर्षों में पूरी तरह अछूती रह गईं और जिन्हें आरक्षण का 1 प्रतिशत लाभ भी नहीं मिल सका,उन्हें प्राथमिकता दी जाए,तथा जो जातियां इसका अधिकतम लाभ उठाकर पूरी तरह सशक्त हो चुकी हैं,उन्हें इस सुरक्षा चक्र से बाहर निकाला जाए।
*-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*
