पॉलिटेक्निक से वाजिदपुर तक मौत का 'डेथ कॉरिडोर'
जौनपुर। "शहर की सड़कें अब चलने के लिए नहीं, बल्कि जान गंवाने के लिए रह गई हैं।" यह आक्रोश उन आम नागरिकों का है जो जौनपुर की सड़कों पर हर कदम डर-डर कर रखने को मजबूर हैं। प्रशासन की लंबी खामोशी और रसूखदारों के अतिक्रमण ने शहर की लाइफलाइन को 'खूनी सड़कों' में तब्दील कर दिया है।
ताजा हादसों ने दहलाया शहर
पिछले कुछ दिनों में जौनपुर ने अपनों को खोया है। वाजिदपुर तिराहे पर 70 वर्षीय जियालाल कनौजिया की ट्रक की चपेट में आने से हुई दर्दनाक मौत और 3 दिन पहले पॉलिटेक्निक चौराहे पर हुआ ट्रेलर हादसा चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि पैदल चलना यहाँ अब 'सुसाइड' जैसा है।
कहां गये फुटपाथ? कहां है प्रशासन?
पॉलिटेक्निक से लेकर वाजिदपुर तक का नजारा खौफनाक है। सड़कों के किनारे की पटरियाँ, जो पैदल चलने वालों के लिए थीं, अब उन पर अवैध कब्जे और पक्के निर्माण का 'अजगर' कुंडली मार कर बैठा है। पैदल चलने वाले मजबूरन मुख्य सड़क पर उतरते हैं जहाँ पीछे से आती तेज रफ्तार मौत (भारी वाहन) उन्हें अपना शिकार बना लेती है।
कागजों पर सुरक्षा, सड़कों पर तबाही
अतिक्रमण का खेल: सड़कों के किनारे पक्के निर्माण और दुकानों के फैलाव ने राहगीरों की जगह छीन ली है। प्रशासनिक मौन: हादसों के बाद चंद घंटों की सक्रियता दिखती है, फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। खौफ का मंजर: पॉलिटेक्निक से वाजिदपुर मार्ग अब सुरक्षित सफर नहीं, बल्कि हादसों का पर्याय बन चुका है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
क्या प्रशासन किसी और बड़ी लाश के गिरने का इंतज़ार कर रहा है? पटरियों पर हुए अवैध कब्जों पर बुलडोजर कब चलेगा? आखिर कब तक जौनपुर की जनता सिस्टम की नाकामी की कीमत अपनी जान देकर चुकाती रहेगी?
निष्कर्ष
अगर जल्द ही अतिक्रमण के खिलाफ कड़ा अभियान नहीं चलाया गया और पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित राह सुनिश्चित नहीं की गई तो ये सड़कें और भी मासूमों का खून पीती रहेंगी। जौनपुर अब कागजी कार्रवाई नहीं, धरातल पर समाधान चाहता है।

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