Jaunpur News : इंग्लिश मीडियम स्कूलों में कापी-किताब के नाम पर लूट, अभिभावक परेशान

  

खेतासराय, जौनपुर। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही नगर सहित क्षेत्र के आस-पास स्थित निजी इंग्लिश मीडियम स्कूलों की मनमानी चरम पर पहुँच गई है। एडमिशन के नाम पर भारी-भरकम शुल्क लेने के बाद अब कॉपी-किताब, यूनिफॉर्म सहित अन्य शैक्षणिक सामग्री के जरिये अभिभावकों से खुलकर वसूली की जा रही है। अभिभावकों का आरोप है कि शिक्षा के नाम पर यह पूरा सिस्टम एक संगठित व्यापार में बदल चुका है जहाँ हर स्तर पर पैसे की माँग की जा रही है। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। जिनके लिये बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना अब दिन-प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा है।


विद्यालय से ही खरीदने की अनिवार्यता, अभिभावकों की स्वतंत्रता खत्म
अभिभावकों ने बताया कि स्कूल प्रबंधन की ओर से साफ निर्देश दिये जाते हैं कि सभी कॉपी-किताबें सहित अन्य सामग्री केवल विद्यालय परिसर या उनके द्वारा निर्धारित दुकानों से ही खरीदी जाय। यदि कोई अभिभावक बाहर से सामान खरीदने का प्रयास करता है तो बच्चों के साथ भेदभाव, कक्षा में बैठने से रोकने या अन्य अप्रत्यक्ष दबाव की स्थिति पैदा कर दी जाती है। इससे अभिभावक मानसिक दबाव में आकर महँगे दामों पर सामग्री खरीदने को विवश हो जाते हैं। यहाँ बड़ा सवाल यह खड़ा होता है क्या शिक्षा संस्थानों को अभिभावकों की पसंद और अधिकार छीनने का अधिकार है? क्या यह नियम शिक्षा के नाम पर एक तरह की जबरन वसूली नहीं है?
 
प्रिंटिंग के नाम पर भारी वसूली, छह कापियों के हजार रूपये
सबसे चौंकाने वाला मामला कॉपियों की कीमत को लेकर सामने आया है। अभिभावकों के अनुसार, मात्र छह कॉपियों के लिए करीब एक हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं। कॉपियों पर विशेष प्रिंटिंग का हवाला देकर कीमत कई गुना बढ़ा दी जाती है जबकि बाजार में यही कॉपियां सस्ते में आसानी से मिल जाती हैं। इसी तरह किताबों का पूरा सेट भी निर्धारित दुकानों से ही ऊँचे दामों पर खरीदने का दबाव बनाया जाता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है क्या यह शिक्षा का मन्दिर है या मुनाफाखोरी का केंद्र? क्या प्रशासन को इस तरह की अनियमितताओं की जानकारी नहीं है या फिर जान—बूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है?

 बच्चों के भविष्य के नाम पर शोषण, अभिभावकों में बढ़ता आक्रोश
अभिभावक अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं लेकिन इस मजबूरी का फायदा निजी स्कूल खुलकर उठा रहे हैं। कई अभिभावकों ने बताया कि वे कर्ज लेकर या अन्य खर्चों में कटौती कर बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें हर साल इसी तरह की लूट का सामना करना पड़ता है। अभिभावकों का कहना है कि यदि वे विरोध करते हैं तो बच्चों के भविष्य पर असर पड़ने का डर बना रहता है, इसलिये वे चुप रहने को मजबूर हैं। यह स्थिति न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि मानसिक उत्पीड़न भी है।

 प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग कार्यवाही कब?
क्षेत्र के अभिभावकों ने जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से इस पूरे मामले की जाँच कर सख्त कार्रवाई की माँग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगायी गयी तो आने वाले समय में शिक्षा पूरी तरह से व्यवसाय बनकर रह जायेगी और आम आदमी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करना और भी कठिन हो जायेगा। अब बड़ा सवाल यह है, क्या प्रशासन इस गम्भीर मुद्दे पर संज्ञान लेगा? क्या अभिभावकों को इस आर्थिक शोषण से राहत मिलेगी या फिर हर साल इसी तरह लूट का सिलसिला चलता रहेगा?

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